विवाह, तंत्र और ज्योतिष विज्ञान



परम तत्व  को २ भागों में बांटा गया है: एक भाग है भगवान् और दूसरा है आत्मा.
आत्मा को भी २ भागों में विभाजित किया गया है -- पुरुष और स्त्री,
इस से  यह  निश्चित हो जाता है कि हर स्त्री आत्मा अथवा पुरुष आत्मा का एक संगत भाग  अर्थात निर्धारित अंश होता है . ये निर्धारित अंश ही  मिलकर एक दूसरे को सम्पूर्ण बनाते है.

  आत्मा के दोनों विभाजित अंशो में एक दुसरे से मिलने के लिए आकर्षण और व्याकुलता होती है . ऐसा इसलिए होता है क्योकि हर आत्मा का लक्ष्य पुनः परमात्मा से मिलना होता है किन्तु इसके पहले एक ही आत्मा के विभाजित अंशो को आपस में मिलना होता है. समय के चलते यह दोनों अंश एक दूसरे से अलग हो गए हैं. ये अलग हुए  अंश पूर्णता के लिए एक दूसरे से मिलने को आतुर होते हैं. पुरुष और स्त्री के बीच मिलने के लिए ये  घबराहट और उत्तेजना इस सहज आकर्षण के कारण ही  है. हम शरीर का रूप बार बार तब तक धारण करते हैं जब तक हमें हमारा खोया हुआ अंश मिल नहीं जाता. जब आत्मा  पूर्ण होती है तभी परमात्मा से  मिलने की यात्रा शुरू  होती है
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हर आत्मा का उर्जा स्तर भिन्न होता है . किन्तु एक ही आत्मा के विभाजित अंशो में उर्जा का स्तर सामान होता है. सम्पूर्णता के लिए दोनों समान उर्जा वाले  ध्रुवों का मिलन आवश्यक है. सही ध्रुवों के मिलन से एक सर्किट/ चक्र  पूरा हो जाता है जिससे एक बहुत शक्तिशाली चुम्बकीय  ऊर्जा उत्त्पन्न होती है जो थिरकन तथा तीव्र गर्मी पैदा करती है. इस ऊर्जा का अगर सही प्रयोग किया जाए तो यह शरीर के चक्रों  का विच्छेदन करके कुण्डलिनी जागरूक करने में सहायक होती है. जैसे जैसे यह ऊर्जा ऊपर की ओर बढती है तो मनुष्य शांत होता जाता है. ऊर्जा के ऊपर बढ़ने का उपोत्पाद शांति होती है तथा नीचे जाने का उपोत्पाद तनाव होता है.

हमारे आभा मंडल  अर्थात उर्जा  स्तर को बढते क्रम में निम्नलिखित सात चरणों में बांटा गया है. ये सूक्ष्म उर्जा स्तर (शरीर) विभिन्न चक्रों अर्थात  प्रवेश द्वारों से सम्बद्ध होते है -

१- भौतिक शरीर - मूलाधार चक्र
२- भाव शरीर - स्वाधिष्ठान चक्र
३- सूक्ष्म शरीर - मणिपुर चक्र
४- मनः शरीर - अनाहत चक्र
५- आत्म शरीर - विशुद्ध चक्र
६- ब्रह्म शरीर - आज्ञा चक्र
७- निर्वाण शरीर - सहस्त्रसार चक्र

आध्यात्मिक विज्ञान की दृष्टि में पुरुष का शरीर धनात्मक है और स्त्री का ऋणात्मक. धनात्मक होने का अर्थ है उत्साह से कार्यों को करने को क्षमता.  ऋणात्मक होने का मतलब है एकत्र करने का स्थान. इसलिए प्रत्येक नारी में एक विशेष शक्ति होती तो है किन्तु वह शक्ति निष्क्रिय अवस्था में होती है. यही कारण है की स्त्री किसी भी कार्य में आक्रामक नहीं होती.

पुरुष का पहला शरीर धनात्मक होता है और दूसरा शरीर ऋणात्मक. इसी तारक स्त्री का पहला शरीर ऋणात्मक होता है और दूसरा शरीर धनात्मक. इसी तरह से अन्य पांच शरीरों के लिए भी समझना चाहिए. जैसा की हम जानते हैं, धन और ऋण ध्रुव मिल कर ही उर्जा को एक्व्रत बना सकते हैं. तंत्र साधना में स्त्री और पुरुष के शरीरों के समन्वय से उत्त्पन्न उर्जा का अत्याधिक महत्व है.

प्रथम धनात्मक शरीर (पुरुष) और ऋणात्मक स्त्री शरीर के सहयोग से उत्त्पन्न शक्ति का साधना में कोई महत्त्वपूर्ण उपयोग नहीं है सिवाय सृष्टि सृजन के, क्यूंकि यह उर्जा इन्द्रिय सुख के धरातल  पर ही समाप्त हो जाती है.

द्वितीय शरीर के सम्बन्ध से उत्त्पन्न शक्ति ही साधना में सहायक होती है. स्मरण रहे की यहाँ पर पुरुष का द्वितीय शरीर ऋणात्मक होता है और स्त्री का धनात्मक. तांत्रिक मंत्रोमं को जागृत करने की क्षमता इस शरीर के सहयोग से प्राप्त उर्जा के माध्यम से ही संभव है.

तीसरा शरीर, जो की पुरुष का धनात्मक होता है और स्त्री का ऋणात्मक, इसका सहयोग इतनी दिव्य उर्जा देता है की हम पारलोकिक सहायता प्राप्त कर सकते हैं जो की महत्त्वपूर्ण कार्यों में साधक का दिशा निर्देश करती हैं.

चौथे शरीर तक पहुंचना अत्यंत कठिन होता है किन्तु जो भी उस स्थिति तक पहुँच जाए तो उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता.

विशेष योग तांत्रिक क्रियाओं के आधार पर जब साधक और साधिका के भौतिक शरीर की उर्जायें आपस में मिलती हैं, तो उस उर्जा से मूलाधार चक्र खुलता है. जब हम साधना के मार्ग पर और आगे बढ़ते हैं और भाव शरीर में पहुँचते हैं, तो उसकी उर्जा से स्वाधिष्ठान चक्र का भेदन होता है. सूक्ष्म  शरीर के सम्बन्ध से मणिपुर चक्र और मनः शरीर के उत्ताप से अनाहत चक्र का भेदन होता है. इस चक्र के भेदन के बाद ही अधात्मिक और पारलोकिक लाभ पूर्ण रूप से उठाया जा सकता है. तंत्र साधना में नारी की भूमिका असाधारण है क्यूंकि साधना की सफलता असफलता नारी की विद्युत् चुम्बकीय आभामंडल पर ही आश्रित है.

जब किसी अलग अलग आत्माओं के २ अंश बिना किसी शुद्धिकरण के आपस में जुड़ जाते हैं (विवाहित हो जाते हैं), वे अपने सम्बन्ध को आध्यात्मिकता की ओर परिपक्व नहीं कर पाते. ऐसा सम्बन्ध सांसारिक स्तर के ऊपर नहीं उठ पता और इससे अज्ञान, मतभेद और अहंवाद उत्त्पन्न होते है. ऐसे सम्बन्ध बहुत तनावी और अशांत होते हैं.

ज्योतिष का  योगदान -  ज्योतिष का मुख्य कार्य  समान ऊर्जा के लोगों का मेल करना होता है, जो की अष्टकूट मिलान के द्वारा किया जाता है. प्रेम आत्मा का अंग है और सच्चा प्रेम तभी उत्त्पन्न होता है जब उसी आत्मा का दोनों अंश एक साथ मिल जाएँ. जब ऐसा होता है, तब सभी दुःख, दर्द, उत्पीडन, संकट, लयभंगता मिट जाते हैं. सिर्फ ख़ुशी रह जाती है जिससे मोक्ष प्राप्त होता है. ऐसे आत्मा के दोनों अंशों का मिलना सही मायने में योग है और तंत्र के द्वारा इसकी प्राप्ति के लिए सही दिशा में प्रयत्न किया जा सकता है.

तंत्र साधना की शुरुआत ब्रह्मचार्य से होती है, परिपक्वता दाम्पत्य जीवन में आती है तथा परम स्थिति  वैराग्य में प्राप्त होती है. इस शक्ति को विनियमित करने के लिए और व्याकुलता से बचने के लिए विवाह की संस्था बनायीं गयी है. विवाह को ४० संस्कारों में शामिल किया गया है, जिससे यह पता चलता है की पवित्र अनुष्ठान है जो जीवन को पवित्र बनाता है. दो  आत्माएं एक साथ मिलकर विवाह के बंधन में बांध जाती है क्योंकि उनके कर्म एक दुसरे से जुड़े हुए हैं और उन्हें साथ मिलकर सांसारिक कार्यों को पूर्ण कर मोक्ष के पथ पर साथ ही अग्रसर होने में ज्योतिष और तंत्र साधनाए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है.

कुण्डलिनी  के  विषय में यहाँ पढ़े - http://rare-facts-in-spirituality.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html