साधना की उन्नति कैसे जानें



यह प्रश्न हर आध्यात्म की यात्रा प्रारम्भ करने वाले व्यक्ति के मन में होता है कि हम कैसे जाने कि हमारा मार्ग सही है या नहीं , प्रगति हो रही है अथवा हम उसी जगह पर ही अथवा हमारी अवनति हो रही है. आध्यात्मिक यात्रा की पूर्णता के लिए तीन  आवश्यकताएं अत्यंत  मौलिक है - पथ, गुरु  और व्यक्ति . इश्वर की प्राप्ति के लिए विभिन्न मार्ग और विधियाँ है.  हर मार्ग के अपने अपने नियम होते है, विधियाँ पृथक होती है और अनुभव की प्रक्रिया भी भिन्न होती है. यह तो हुई मार्ग की बात.  इसी प्रकार प्रत्येक  व्यक्ति की वृत्ति, संस्कार और कर्म करने की क्षमता अलग अलग होती है , जिसके कारण  प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति में अंतर आ जाता है. इस प्रकार किसी भी साधक को होने वाली अनुभूतियाँ इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति की स्थिति क्या है और मार्ग कौन सा है.  यदि मार्ग व्यक्ति की प्रवृत्ति के अनुरूप होता है अर्थात उपयुक्त होता है तो सफलता अति शीघ्र मिलती है. 

इस बात को इस उदाहरण से समझे कि यदि कोई कामुक व्यक्ति अप्सरा साधना बिना अपनी प्रवृत्ति को समझे कर ले तो यह साधना ही उसके पतन का कारण बन जाएगी. अप्सरा साधना कई बार काम वासना में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि कर देती है.  वह व्यक्ति जिसका ध्यान इसी ओर अधिक हो और इस इच्छा की पूर्ती के लिए  साधन /पथ के लाभ , हानि और नियमों  का बिना गहराई से विश्लेषण किये साधना को आरम्भ करता है तो काम की इच्छा अन्य व्यक्तियों की तुलना में  इस व्यक्ति को अधिक परेशान करेगी, क्योकि यह इच्छा उस व्यक्ति की विशेष आतंरिक कमी है. इस कमी को दूर करने के लिए व्यक्ति को उस मार्ग का चुनाव करना चाहिए जो काम की मात्रा संतुलित करे . इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति को क्रोध अधिक आता है और वह उग्र पथ का चुनाव करे , अत्याधिक भावुक हो और ऐसी साधना का चुनाव करे कि भावुकता बढ़ जाए तो आतंरिक और वाह्य दोनों व्यवस्थाएं असंतुलित होने लग जाती है. 

साधना का अर्थ होता है - स्वयं को साध लेना और यह तभी संभव होता है जब काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की मात्रा को संतुलित कर लिyया जाये. जब यह पाँचों संतुलित मात्रा में होते है तो विकार का निर्माण नहीं करते है वरन आत्म अनुभूति के मार्ग के सहायक बन जाते है. यही कारण है कि व्यक्ति के लिए साधना की विधि का चुनाव स्वयं गुरु, उसकी आतंरिक और वाह्य स्थिति को देख कर करते है. कब किस मंत्र का चुनाव करना है , किस समय किस विधि को करना है , किस परिस्थिति में क्या सावधानी अधिक रखनी है इत्यादि इत्यादि का निर्देशन गुरु समय समय पर साधक की प्रगति की अनुरूप करते रहते है.  पूर्ण गुरु का उद्देश्ययह रहता है कि उनकी शरण में आया हुआ व्यक्ति जीवन की सम्पूर्णता को प्राप्त करे और उसके लिए वह हर प्रकार की बाधा / विकार को दूर करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहते है . पूर्ण गुरु के पास हर बाधा का समाधान होता है और यही उनकी पहचान होती है. इसका कारण यह है कि जो पूर्ण अर्थात इश्वर के समीप होता है, सपूर्ण सृष्टि, उस तक पहुचने वाले रास्तों, बाधाओं और उससे निपटने के उपायों का ज्ञान उसके लिए सहज उपलब्ध होत

अब सम्पूर्णता की यात्रा के लिए तीसरी और महत्त्वपूर्ण कड़ी है - साधक .  किसी भी व्यक्ति के अन्दर तीनो गुण (सत्व , रज , तम ) विद्यमान होते है . जिस गुण की मात्रा अधिक होती है उसी के अनुसार उस की मुख्य प्रकृति का निर्धारण होता है .  जैसे एक गाडी को चलाने के लिए ब्रेक, क्लच और ऐक्सेलरेटर तीनों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार जीवन की गाडी को चलाने के लिए तीनो गुणों की आवश्यकता होती है. किन्तु हमारी समस्या यह होती है कि पूर्व जन्म के अनेक कर्मों के कारण इन गुणों की विकृति अधिक हो जाती है जिसके कारण हमारा मन हमारे नियंत्रण में नहीं रहता है. इस कारण वर्तमान जन्म के कर्म माया से प्रभावित होकर संसार में ही उलझा कर रखते है और साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ने देते है. इस अवस्था में गुरु पहले साधक के मुख्य बाधक कर्मों का सुधार उपयुक्त  दान, मन्त्र, यंत्र कर गुणों को संतुलित करते है. विधि और मन्त्र इत्यादि का चयन गुरु ज्योतिष विज्ञान की सहायता ले कर या ध्यान की अवस्था में पहुच कर ज्ञात करते है. ध्यान की अवस्था में पहुंचकर अन्य व्यक्ति के विषय में जानना बहुत सारे कारणों से सहज नहीं होता किन्तु ज्योतिष विज्ञान से इसका ज्ञान थोडा सहजता से प्राप्त किया जा सकता है. यही कारण है कि गुरुकुल में ज्योतिष विज्ञान का अध्ययन वेदों के साथ कराया जाता था. 

जब भी कोई अपना शुद्धिकरण आरम्भ करता है तो यह जिज्ञासा मन में सहज उठती है कि क्या साधना की उन्नति को समझा जा सकता है ? उत्तर है - निःसंदेह।  प्रश्न यह है कैसे ? जब बच्चा नर्सरी कक्षा से दूसरी कक्षा में जाता है तो उसको गिनती आ जाती है, अक्षरों की पहचान हो जाती है, बोलना अच्छे से आ जाता है, घर से बाहर निकलने का और अन्य लोगों से बातचीत का आत्मविश्वास आ जाता है. उसी प्रकार जब हम आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ते है तो ईश्वर की ओर हमारा रुझान अधिक होने लगते है. उनके विषय में जिज्ञासा बढ़ने लगती है. ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण क्यों किया, दुखों से मुक्ति का उपाय क्या है, हमारे अंदर क्या कमियां है जिनको हमको दूर करना चाहिए, इस संसार में आने का हमारा मुख्य उद्देश्य क्या है , माया के उस पार क्या है  जैसे प्रश्न मन को आंदोलित करने लगते है. जैसे जैसे इन प्रश्नों के उत्तर की खोज अन्य ज्ञान के माध्यमों जैसे वेद इत्यादि के अध्यन और गुरु के दिशा निर्देशनों का दृढ़ता से पालन करते जाते है विकारों की पकड़ मन से कम  होने लगती है. जिसके फलस्वरूप मन को शांति का अनुभव होने लगता है, मंत्र जाप में आनंद आने लगता है, सांसारिक बातें अधिक अच्छी नहीं लगती, वाद विवाद से दूर होने लगते है, व्यर्थ के कामों से रूचि कम होने लगती है, सही कार्यों के लिए एकाग्रता बढ़ने लगती है. व्यर्थ की भावुकता समझ आने लगती है, क्रोध -काम इत्यादि की पहचान होने लगती है। जब और आगे बढ़ते है तो व्यर्थ की भावनाओं से दूरी बनने लगती है जैसे जब क्रोध आने वाला है तो उसका एहसास होने लगता है किन्तु क्रोध पर नियंत्रण करने की क्षमता भी आने लगती है।  हर बात पर प्रतिक्रिया धीरे धीरे कम होने लगती है. सामने वाले  व्यक्ति की सीमाये और क्षमताये समझ आने लगती है जिसके अनुसार हम अपना व्यवहार निर्धारित करने लग जाते है जिससे समय और ऊर्जा का नुकसान ना हो।  उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति दान या मन्त्र जाप की प्रक्रिया में विशवास नहीं करता है तो उसको व्यर्थ में नहीं समझाएंगे. यदि किसी कारणवश समझाते भी है और उस व्यक्ति की प्रतिक्रिया हमारे अनुकूल नहीं होती है तो उसकी बातों को ह्रदय पर नहीं लेते है , दूसरे शब्दों में मान अथवा अपमान से ऊपर उठ कर आगे बढ़ जाते है. इसके अलावा अन्य अनुभूतियाँ जैसे निद्रा की स्थिति परिवर्तित होना , सुखद और गहरी नींद का आना, कार्यों का सम्पादन करने की क्षमता का बढ़ना , ग्रहण क्षमता का विकास होना, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य धारण करने की शक्ति का विकास जैसे सदगुण प्रभावी होने लगते है।  

कब किस गुण का विकास होगा और कैसे होगा इसका निर्धारण स्वयं परमात्मा करते है. क्योकि इन अनुभूतियों के लिए कुछ कर्मों का कटना आवश्यक होता है.  सबसे पहले वह नकारात्मक कर्म कटते है जिनकी तीव्रता कम होती है।  अधिकांशतः वह वर्तमान जन्म के कर्म होते है।  जब ऐसे कर्मों की ऊर्जा रूपांतरित होती है तो इसके कारण  हमारी समझ का विकास होता है , करने की क्षमता बढ़ती है और सबसे बड़ा परिवर्तन नियमों के पालन के प्रति सजग होने लगते है. जब इस प्रक्रिया को और आगे बढ़ाते है तो पुराने जन्म के कर्म कटने लगते है. जब ऐसा होने लगता है तो आतंरिक और वाह्य दोनों में परिवर्तन होने लगता है. किन्तु यह सब इतना सहज नहीं होता है. जैसे दूसरी कक्षा में प्रवेश से पहले इस संसार में भी हमको परीक्षा देनी पड़ती है अर्थात अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है , उसी प्रकार साधना में भी अगले चरण पर पहुचने के लिए अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है. साधक अपनी परीक्षा उत्तीर्ण  कर सके  लिए गुरु पूर्ण  तत्पर रहते है. शिष्य अथवा साधक को सभी आवश्यक विषय वस्तु उपलब्ध कराते है, जिस विषय में साधक कमजोर है उसकी तैयारी पर विशेष ध्यान देते है - यह गुरु का कार्य क्षेत्र है. किन्तु शिष्य का दायित्व यह होता है कि वह समस्त दिशा निर्देशों का हर स्थिति में नियमित रूप से पालन करे.  

जब गुरु और शिष्य सही पथ पर सही विधियों का पालन करते है तो आध्यात्मिक यात्रा निःसंदेह सम्पूर्ण होती है और जगत के कल्याण के लिए शिष्य / साधक के योगदान का आरम्भ......... 

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