पूर्व संस्कारों को कैसे परिवर्तित करें



जीवन - शरीर, मन और आत्मा  तीन महत्त्वपूर्ण तत्वों का समन्वय है . जीवन सुचारू रूप से चले इसके लिए तीनो तत्वों के बीच सही प्रकार से सम्बन्ध होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है . किन्तु यदि यह सम्बन्ध उचित प्रकार से स्थापित नहीं हो तो जीवन कठिनाइयों से ग्रसित हो जाता है . 
प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रवृत्ति के अनुसार जीवन का स्तर निर्धारित करता है . कुछ लोग शरीर के स्तर पर जीते है और कुछ लोग मन के स्तर पर जीते है. किन्तु सर्वश्रेष्ठ स्तर आत्मा का होता है . 
जो लोग शरीर के स्तर पर जीते है वह हमेशा शरीर को आकर्षक बनाये रखने अथवा उससे सम्बंधित आवश्यकताओं की पूर्ती में ही व्यस्त रहते है. जो लोग मन के स्तर पर जीते है वह हमेशा भावनाओं, विश्लेषण, तर्क वितर्क, अपेक्षाओं में ही अपना समस्त जीवन व्यतीत कर देते है . ऐसा नहीं है कि शरीर अथवा मन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करना चाहिए किन्तु यह पूर्ति इस प्रकार होना चाहिए कि भविष्य में हमको सुख और शान्ति सच्चे अर्थों में प्राप्त हो . यह केवल तभी संभव है जब आत्मा के स्तर पर जीवन को जिया जाए . 

 आत्मा के स्तर पर जीने का अर्थ है जागृत होकर जीना . जागृत होकर जीने के लिए शरीर, मन, संसार/ प्रकृति और ईश्वर के नियमों का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है. ज्ञान होने के पश्चात उससे सम्बंधित सभी आवश्यक नियमों का व्यवहार में पालन करना अत्यंत आवश्यक है. जब ज्ञान व्यवहार में उतरने लगता है तो मानवीय चेतना, परम चेतना अर्थात ईश्वर के साथ जुड़कर, शरीर और मन के स्तर से ऊपर उठ जाती है।  

आत्मा के स्तर पर जीने के लिए शरीर और मन की बाधा को पार करना पड़ता है।  इस बाधा को पार करने के लिए शरीर और मन के लिए कुछ आवश्यक नियमो को ऋषि मुनियों ने सबके लिए जीवन के हर स्तर पर बनाये है।  मनुष्य जीवन के प्रत्येक पक्ष से सम्बंधित नियम वेदों उपनिषदों में है।  इसकी समय समय पर विवेचना विभिन्न संतों ने मनुष्यों के कल्याणार्थ हर युग में विभिन्न प्रकार से हुई है किन्तु सबका सार और उद्देश्य एक ही है - वह है जीवन को श्रेष्ठ स्तर पर जीना।  




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संक्षिप्त रूप में कहा जाए तो शरीर को संतुलित करने के लिए आहार विहार का नियमन, योग के माध्यम से उसका सशक्तिकरण और विधिपूर्वक शरीर का उपयोग आवश्यक है।  शरीर की अपेक्षा मन को संतुलित करना अधिक दुष्कर कार्य है क्योकि शरीर दृश्य है और मन अदृश्य।  मन अदृश्य हो कर अधिक शक्तिशाली हो जाता है और शरीर को उसके अनुसार चलने के लिए बाध्य होना पड़ता है।  जैसे हमे ज्ञात होता है कि सुबह जल्दी उठना चाहिए , योग करना चाहिए और आवश्यकता से अधिक भोजन केवल स्वाद के लिए और अन्य भोगों का भोग अधिक  नहीं करना चाहिए।  किन्तु मन चाहे तो इन सभी बातों को परिवर्तित कर सकता है।  मन की अवस्था अच्छी नहीं हो तो शरीर भी सुस्त हो जाता है।  मन को व्यवस्थित करने के लिए सत्संग, अध्ययन, ध्यान, मन्त्र जाप और भावनाओं का सजगता के साथ अवलोकन का विधान है।  स्मरण रखे कि मन शरीर के साथ जुड़ा होता है इसलिए मन को संतुलित करने के लिए शरीर को साधना भी अत्यंत आवश्यक है।  

यहां पर अब सृष्टि के एक नियम  के विषय में विचार करना महत्त्वपूर्ण है।  वह है कर्म का नियम।  हमारा शरीर, मन, सम्बन्ध और सुख-दुःख की परिस्थितियां सब कुछ कर्म के नियम के अनुसार ही प्राप्त होता है।  उस पर भी मन जो कि आत्मा से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण यंत्र है, उसी में हमारे पूर्व जन्मों  की असंख्य वासनायें/ इच्छाएं / संस्कार सब कुछ समाहित होता है।  इन्ही संस्कारों से हमारा स्वभाव बनता है और उसी के अनुरूप हम वर्तमान में क्रिया एवं प्रतिक्रिया करते रहते है।  हमारा चयन करने का अधिकार जो हमें प्रकृति से प्राप्त है , वह भी इन पूर्व कृत कर्मों के द्वारा प्रभावित होता है।  और स्वभाव से प्रभावित होकर  जिसका भी हम चयन करते है वह उसी संस्कार को और प्रबल करता है।   तो प्रश्न यहाँ पर यह उठता है कि मनुष्य को पूर्व जन्म के सघन संस्कारों के प्रबल  प्रभाव से मुक्ति कैसे प्राप्त हो ?  

ईश्वर ने समस्या में ही समाधान छुपा रखा है।  जब भी हमारे जीवन में समस्याएं आती है और वह हमें त्रस्त कर देती है तो मन की शान्ति और समस्या के समाधान के लिए गुरु अथवा ईश्वर की ओर उन्मुख होते है।  ईश्वर भी प्रथम रूप में समाधान के लिए गुरु से ही मिलाते है।  गुरु अपने दिव्य आत्म ज्ञान और ज्योतिष विज्ञान के माध्यम से हमारे स्वभाव और कर्मों के विश्लेषण के उपरान्त जीवन में कुछ नियमों का समावेश करवाते है।  जैसे समय पर उठना , पूजा का एक समय और मंत्रो की संख्या निर्धारित करना  , योगासनो, मुद्राओं और सात्विक भोजन का महत्त्व बता कर उसकी ओर प्रेरित करते है। हमारे भावनात्मक आवेशों और प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए समय समय पर दिशा निर्देश दे कर नए अनावश्यक संस्कारों एवं कर्म बंधन के निर्माण पर रोक लगाते है।  

इस प्रकार जब एक समस्या का समाधान होता है और नए शुभ कर्मों की शक्ति मन को सकारात्मक ऊर्जा देकर जीवन को एक नया दृष्टिकोण देती है।  जिसके फलस्वरूप मैं कौन हूँ  इत्यादि प्रश्न मन में उठने लगते है। वाह्य संसार से मन कुछ क्षण हटकर आतंरिक विश्लेषण की ओर प्रवृत्त होता है और शुभ कर्म करने की ओर झुकाव होने लगता है।  यही वह समय होता है जब मन को पुनः संकल्प के द्वारा दिशा दी जाए तो वह आत्म ज्ञान की राह पर चल पड़ता है।  इस मार्ग पर प्रवृत्त होने के उपरान्त भी पूर्व संस्कार समय समय पर बाधाये खड़ी करते है।  मन विचलित होता है और प्रश्नो के उत्तर भी पूर्णतः संतुष्ट नहीं कर पाते है।  प्रकृति के नियम जटिल  होने के कारण मन में कई बार निराशा  भी घेरने लग जाती है।  ऐसे समय में गुरु पर विश्वास और उनके बताये हुए नियमों का हर परिस्थिति में अभ्यास ही एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ उपाय होता है।  

अज्ञानता के साथ  अर्थात इच्छाओं के वशीभूत किया  हुआ कर्म बंधनकारी होता है  किन्तु  गुरु / वेद / शास्त्र  के दिशानिर्देशन में किया हुआ कर्म पुराने बंधनों से मुक्त भी करता है एवं ईश्वर से भी मिलवा देता है। संत जनों अथवा शास्त्रो के  नियमों के पालन से जब सकारात्मक ऊर्जा की मात्रा में वृद्धि होती है तो अशुभ संस्कारों की शक्ति में कमी होने लगती है जिससे उनका हमारे जीवन पर प्रभाव भी कम होने लगता है।  जब शुभ कर्मों के ऊर्जा की मात्रा, नकारात्मक संस्कार की ऊर्जा की मात्रा के बराबर हो जाती है तो उस संस्कार का पूरी तरह उन्मूलन हो जाता है।  संस्कार से स्वभाव बनता है अतः संस्कार को परिवर्तित करना है तो स्वभाव को परिवर्तित करना होगा . स्वभाव का परिवर्तन केवल उचित नियमों के पालन से ही संभव हो सकता है .  इसमें समय अवश्य लगता है किन्तु यह कार्य असंभव भी नहीं है .

आवश्यकता है तो केवल इस पथ पर निरंतर चलते रहने की,  विश्वास की और अभ्यास की .......