प्रार्थना कैसे करें

      

प्रार्थना का अर्थ है प्रकृष्ट की अर्चना अर्थात पूर्ण श्रद्धा, विनम्रता और विश्वास के साथ अपने हृदय का अनुरोध इश्वर के समक्ष रखना.

प्रार्थना के चार आवश्यक अंग हैं:

१. सबसे पहली महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है नम्रता. सतर्क रहते हुए भी नम्रता के साथ अपने हृदय की तीव्रतम इच्छा को इश्वर के समक्ष रखने पर इश्वर की शक्ति आपकी प्रार्थना में उतरती है. जब तक आप अपने ज्ञान और शक्ति पर भरोसा करते हैं, इश्वर सामने नहीं आते हैं. अर्थ यह हुआ कि हमारी दूसरे साधनों पर निर्भरता, घमंड और दिखावापन इश्वर तत्व के प्रकट होने में सबसे बड़ी बाधा होते हैं. इसलिए हमें अपनी कमियों के प्रति जागरूक और सतर्क रहना चाहिए जिससे की प्रार्थना के समय अहंकार की उपस्थिति न हो और हम ईश्वर  के समीप पहुँच सकें.

२. हम जिस भी इश्वर की अराधना करें, हमें उसकी विशेषताओं, स्वभाव और उत्कृष्टता के बारे में ज्ञान होना चाहिए. इश्वर के गुणों का ज्ञान इश्वर से प्रेम बढाने और इश्वर का ध्यान करने में सहायक होता है. प्रार्थना करते समय हमें उस परम शक्ति पर यह पूर्ण विश्वास होना चाहिए की वह हमारे हृदय की प्रार्थना अवश्य सुनेंगे क्योंकि वह बहुत करुणामय हैं.

३. तीसरी आवश्यकता इश्वर में संपूर्ण रूप से निहित हो जाना अथवा उनके ध्यान में पूरी तरह डूब जाने की होती है. प्रार्थना के समय जब हम खुद को भूल जाते हैं और केवल इश्वर को याद रखते हैं, तब हमारी प्रार्थना सार्थक सिद्ध होती है. यही वो समय होता है जिसमें आपके और इश्वर के बीच से संसार की समस्त चिंताएं लुप्त हो जाती हैं और इश्वर को प्रार्थना स्वीकार करनी ही पड़ती है.

४. प्रार्थना के समय विचार शून्यता  की अवस्था होनी चाहिए. मन जब तक अव्यवस्थित और भटका हुआ रहता है, तब तक प्रार्थना के स्वर इश्वर तक नहीं पहुँचते हैं. प्रार्थना के समय कोई भी इच्छा, आवेश और असंतुष्ट होने की स्थिति इश्वर से जुड़ने में बाधा उत्पन्न करती है.

निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं की प्रार्थना तभी फलीभूत होती है जब अपने अराध्य देव के प्रति पूर्ण विश्वास, सकारात्मक विचार, शांत मन और मन में इश्वर की छवि विराजित हो.


महत्त्वपूर्ण तथ्य


कई बार जब हम ध्यान/जाप/प्रार्थना करने बैठते हैं, तो कई पुरानी बातों और विचारों को मन बहुत तीव्रता के साथ दोहराने लगता है और चाह कर भी हम उन विचारों से खुद को अलग नहीं कर पाते हैं. जब भी ऐसा हो तो मनुष्य/साधक को विचलित नहीं होना चाहिए. वरन अपना जाप सहज रूप से, बिना विचारों  से लड़े, पूरा करने का प्रयास करना चाहिए. ऐसा इसलिए होता है की हमारे मन में कहीं गहरे छुपे हुए विकारों को भी जाप/मंत्र साधना/प्रार्थना बाहर निकाल कर मन को उन विकारों से स्वतंत्र कराती है. ऐसे समय में आवश्यक सिर्फ यही होता है की इश्वर पर पूर्ण आस्था रखें और नियमित रूप से अपना जाप करते रहे. धीरे धीरे विचार और विकार स्वयं शांत हो जायेंगे.