मन के विभिन्न पक्ष

हम सभी अक्सर मन के विषय में बात करते है , किन्तु मन वास्तव में क्या है - इसके विषय में अधिक ज्ञान नही होता है ! अधिकांशतः हम यह तो महसूस करते है कि दिमाग अलग है और मन अलग , किन्तु इसके विषय में सही अनुमान नही लगा पाते  है ! इस बात से हम सभी सहमत है की मन दिखाई नहीं देते हुए भी व्यक्तिव का महत्वपूर्ण अंश है !

सभी जीवात्माओ का अस्तित्व तीन स्तंभों पर आधारित है - शरीर, मन और आत्मा .  मन , शरीर और आत्मा के बीच सेतु का काम करता है ! मनुष्य के व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण तत्व आत्मा होती है जो कि शरीर और मन दोनों को शक्ति प्रदान करती है और नियंत्रित करती है ! यह अपरिवर्तनशील , सूक्ष्मतर , जाग्रत और अचल होती है

 हमारा भौतिक शरीर व्यक्तित्व का बाहरी भाग होता है, जबकि मन व्यक्तित्व का सूक्ष्म अर्थात आतंरिक भाग होता है. शरीर और मन दोनों ही परिवर्तनशील होते है और इनकी क्षमताएं सीमित होती है . शरीर से अधिक शक्तिवान मन होता है और मन से अधिक शक्तिशाली आत्मा होती है. यही कारण है कि शरीर सबसे पहले थक जाता है किन्तु मन शरीर के थकने के पश्चात भी क्रियाशील रहता है. शरीर की उर्जा का व्यय दैनिक कार्यो का सम्पादन करते हुए होता है.  शरीर को अपनी उर्जा को व्यवस्थित करने के लिए भोजन,आराम करने की और निद्रा की आवश्यकता होती है. मन का स्वभाव है विचार करना. मन में तरह- तरह  के विचार हर समय घूमते रहते है . मन बहुत सारी  भावनाओं , विश्लेषण  और तर्क वितर्क में उलझा कर रखता है . इस उलझन के कारण कुछ भ्रम की स्थितियां बनती है जो  हमें सत्य से दूर कर देती है !  मन की उर्जा का क्षय विचारों के द्वारा होता है, विचार  भी उर्जा का एक रूप  होते है. हमारी मानसिक उर्जा का बहुत अधिक विचार करने से क्षय हो जाता है जिसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है ! यही कारण है कि जो बहुत अधिक सोच विचार करते है उनकी शारीरिक क्षमता कम होती है.   

यही मन जब निंद्रा अवस्था में जब शांत होता है,  तो आत्मा के नजदीक पहुँच जाने के कारण  , नींद से उठने के पश्चात् हम अधिक स्वस्थ और तरो ताजा महसूस करते है . इसका अर्थ यह हुआ की यदि मन को शांत कर लिए जाये तो आनंद और तरो ताजा रहने की अनुभूति को अधिक लम्बा किया जा सकता है ! 

मानव मन एक प्रक्षेपक यन्त्र कि तरह कार्य करता है . यह मन यदि इश्वर कि और मुड़ जाये तो ईश्वर के स्वरुप को प्रतिबिंबित करता है किन्तु यही मन यदि संसार की ओर मुड़ जाये तो बुद्धि सीमित हो जाती है और उसमे भ्रम , विक्षोभ उत्पन्न होकर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.जिस प्रकार शीशे पर धूलि मिट्टी  जमी हुई हो तो हम अपना  प्रतिबिम्ब नही देख सकते है!  इसी प्रकार हमारे मन पर पाप और अज्ञान रुपी धुल मिट्टी जमा होने पर हम आत्मा के सत्य का और उसकी शक्ति का अनुभव नही कर पाते  है !  मनुष्य की आत्मा अपने पास की वस्तु का रंग ग्रहण कर लेती है ! यही कारण है कि जब मन अशुद्ध होता है तो आत्मा के निकट होने के कारण मन का स्वरुप ग्रहण कर लेता है और स्वतंत्र , अनंत सर्व शक्ति संपन्न और सर्वोच्च होने के बावजूद भी बंधन में बंध जाता है !  समस्त पन्थो में मन के नियंत्रण पर इसी कारणवश अधिक ध्यान देने के निर्देश होते है. साधना और ध्यान के अभ्यास से आत्मा अपने स्वरूप को पहचान लेती है किन्तु अपने वास्तविक रूप को प्रकट करने के लिए व्यवस्थित  रूप से कर्म करने की आवश्कता होती है !  यदि मन के कारण समस्त समस्याए है तो आत्मा के ज्ञान में ही सारी समस्याओ का समाधान है !

मन कैसे बनता है -

भगवान् बुद्ध के अनुसार हम जो आज है वह हमारे पुराने विचारो का प्रत्यक्षीकरण है. कोई भी विचार किसी भी स्थिति में उत्पन्न हो उसका कभी क्षय नहीं होता है , वह विचार चाहे मानसिक हो अथवा भौतिक कार्य रूप में परिवर्तित हो गया हो , सबका एक निश्चित फल अर्थात परिणाम अवश्य होता है. परिणाम को भोगने का समय और स्थान परमात्मा निर्धारित करते है. जब तक यह फल सम्मुख नहीं आता है अर्थात भोग नहीं लिया जाता है , तब तक यह मन में संस्कार रुपी बीज के रूप में संचित रहता है .

प्रत्येक  विचार की तीन अवस्थाये होती है  :-  प्रथम अवस्था :- वह अवस्था है जब उसका उदय होता है ! जिसका हमें ज्ञान नही होता है ! दृतीय अवस्था :- वह अवस्था है जब विचार ऊपरी सतह तक पहुँच जाता है ! तृतीय अवस्था :- वह अवस्था है जब वह बाहर निकल जाता है अर्थात क्रियान्वित हो जाता है .  जब विचार इच्छा से सयंम करता है तब उसे शक्ति कहते है और सूक्ष्म विचार स्थूल रूप धारण कर लेता है अर्थात विचार को कार्य रूप कर्म द्वारा प्रदान किया जाता है ! 

 विचार का सघन रूप है - भावनाएं . वह विचार जिसको हम बार बार पुनरावृत्ति कर प्रबल करते है भावनाओं के रूप में अभिव्यक्त होते है . विचारो का उद्गम इच्छाओं से होता है और इच्छाए संस्कारों का संगृहीत रूप होती है. अब प्रश्न यह उठता है की संस्कारों के एक निश्चित रूप में होने के पीछे कौन सा कारण होता है ?  यह कारण कर्म होता है. वह कर्म जिनका फल हम पिछले जन्म में भोग नहीं पाए होते है. 

कोई भी कर्म चाहे वह शारीरिक हो अथवा मानसिक हो या वाणी द्वारा किया गया हो, मुख्यतः दो तरह के परिणाम लाता है. परिणाम का समय और स्थान कर्मो की तीव्रता और  गुणवत्ता पर आधारित होता है. प्रथम परिणाम भौतिक जगत में दिखाई देता है, जिसे स्थूल परिणाम कहते है. दूसरा होता है सूक्ष्म परिणाम जो कि मन में संस्कार रूप में संगृहीत हो जाता है. यही संस्कार स्वभाव बनाते है.   अज्ञान , भय , इच्छाए और अहंकार इत्यादि मानसिक गुणों की अभिव्यक्ति इस संस्कारों की बहुलता पर निर्भर होती है. इन संस्कारों से प्रभावित होकर उसी प्रकार के कुछ निश्चित कर्मों के करने की ओर प्रवृत्ति अधिक होती है, जिसके कारण यह संस्कार धीरे - धीरे प्रबल होते जाते है. जब यह संस्कार प्रबल हो जाते है तो मन के  धरातल से ऊपर उठकर शरीर एवं वाणी के द्वारा सशक्त रूप में अभिव्यक्त होने लगते है. परिस्थितियों पर व्यक्ति की मानसिक प्रतिक्रिया अर्थात सुख-दुःख इत्यादि से जुड़े रहना संस्कारों के मानसिक रूप की ही अभिव्यक्ति है .इन्ही संस्कारों के वशीभूत होकर मन विभिन्न प्रकार के कर्मो में उलझ कर सुख और दुःख का भागी बनता रहता है और जन्म - मरण का यह चक्र निरंतर चलता रहता है.

मन और पुनर्जन्म -

मनुष्य के  तीन मुख्य शरीर है - स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीर .

कारण शरीर,  स्थूल और सूक्ष्म शरीरों का कारण है, इसलिए उसे कारण शरीर कहते हैं।इसके कारण हमें चेतना का अनुभव होता है।

स्थूल शरीर वह है जो हमें दिखाई देता है . स्थूल शरीर आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी - इन पंचमहाभूतों से बना है। इसके पोषण के लिए अन्न  की ज़रूरत होती है. इसकी कुछ सीमाए भी है . 

सूक्ष्म शरीर पंचप्राण, दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से मिलकर बना है। सूक्ष्म शरीर में अन्न  की आवश्यकता नहीं होती है . विचार और भाव उसका पोषण करते है सूक्ष्म शरीर को इसीलिए आने जाने में समय नहीं लगता .मन, बुद्धि,  चित्त  और अहंकार तथा कारण शरीर सूक्ष्म शरीर में ही वास करते है यही सूक्ष्म शरीर पुनर्जनम ग्रहण करता है . पूर्व जन्मों के शेष कर्मो का फल और पूर्व जन्म के कर्मों के द्वारा प्राप्त अनुभव सूक्ष्म शरीर में संस्कार के रूप में संगृहीत होकर आत्मा के साथ नए शरीर में प्रवेश कर जाते है.  समय के साथ यह संस्कार परिपक्व होकर स्वभाव का और कुछ आवश्यक परिस्थितियों का निर्माण करते है.

 स्वभाव और परिस्थितियां इस आधार पर निर्धारित होती है कि जिन कर्मों का भोग शेष रह गया है उनमें किस प्रकार के कर्मों की अधिकता है. यदि शुभ कर्म अधिक है तो अच्छे माता पिता और समृद्ध घर में जन्म होता है जिसके कारण अच्छी विद्या और नौकरी प्राप्त होती है जो की जीवन को सहज रूप से चलाने में सहायक सिद्ध होता है. शुभ कर्मो का बाहुल्य हर बार धन की प्रचुरता के रूप में न होकर सात्विक प्रवृत्ति के रूप में भी होता है और अनुकूल परिस्थितियां सत्व गुण के विकास में सहयोगी बन कर इश्वर के प्रति प्रेम का भी उदय करती है. इसके विपरीत यदि अशुभ कर्मो की अधिकता है तो जन्म विषम परिस्थितियों में होता है जहा पर सुख सुविधाओं का अभाव होता है या संगति अच्छी नहीं मिलती है जिसके कारण जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ हो जाता है. किसी भी व्यक्ति के वह कर्म जो शेष रह गए है और वर्तमान जन्म में भोगने है वह न तो पूरी तरह शुभ  और न ही पूरी तरह अशुभ होते है वरन शुभ और अशुभ कर्मों का मिश्रण होते है. इसी मिश्रण के आधार पर सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवृत्ति का निर्माण होता है.

मन की त्रिगुणात्मक प्रवृत्ति -

मनुष्य का मन तीन अंशों से मिलकर बना है - सत्व रज और तम । संस्कारों के आधार पर किसी एक गुण की बहुलता अवश्य होती है किन्तु समयानुसार दूसरे तत्व भी अपना प्रभाव दिखाते रहते है. रज तत्व के कारण मन कर्म करने की ओर प्रवृत्त होता है एवं सांसारिक  प्रभावों के कारण आंदोलित रहता है। तम तत्व के कारण मन में  निष्क्रियता और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सत्व गुण के कारण मन में शांति का अनुभव होता है और विवेक का उदय होता है। इन तीन गुणों के प्रभाव के कारण मन निरंतर परिवर्तनशील रहता है।  
इन गुणों के विभिन्न अनुपातों के आधार पर मन की अभिव्यक्ति छह रूपों में होती है - भय, प्रेम, घृणा, प्रसन्नता, वासना और उच्चाटन की स्थिति . प्रेम मन की सहज स्थिति है किन्तु यही प्रेम यदि अधिक मात्रा में हो जाये तो व्यवहारिकता और ज्ञान को समझने से मना कर देता है और समाज एवं स्वभाव में असंतुलन का कारण बन जाता है. अत्याधिक प्रेम के कारण अधिकार एवं अपेक्षाओं की प्रवृत्ति की उत्पत्ति हो जाती है जो आगे चलकर भय, अवसाद और दुःख के रूप में अभिव्यक्त होती है. मन का यह नकारात्मक रूप विवेक और बुद्धि को भ्रमित कर देता है जिसके कारण कर्मो में अशुद्धि आ जाती है और कर्म फल का बंधन आरोपित हो जाता है. इसी प्रकार मन के दुसरे गुण जैसे घृणा, वासना इत्यादि भी कर्म के स्वरुप को शुद्ध नहीं रहने देते है. उच्चाटन अर्थात बोरियत भी मन का नकारात्मक गुण है. किसी भी एक गुण की आवश्यकता से अधिक मात्रा मन के अन्य नकारात्मक गुणों के साथ मिलकर दुःख का सृजन करती है.

मन के विभाग -

हमारा मन तीन स्तरों पर क्रिया शील है :- 1. चेतन,  2. अवचेतन,   3. अतिचेतन 

मन के चेतन भाग के कारण हम संसार और स्वयं से जुड़ते है. चेतन मन पांच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सूचना ग्रहण करता है . चेतन मन के कारण विचारो, तर्क वितर्क, सिद्धांत एवं वाणी का प्रयोग कर निर्णय लेता है एवं सांसारिक कार्यों का सम्पादन करता  है .

अवचेतन मन में अतृप्त इच्छाएं , पूर्व जन्म के कर्मों द्वारा प्राप्त अनुभव और अन्य स्मृतियाँ , बीज रूप में संगृहीत हो कर रहती है. पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप जिस बुद्धि का निर्माण होता है उसका स्थान अवचेतन मन ही है. इस बुद्धि के प्रभाव के कारण ही वर्तमान जन्म के निर्णय प्रभावित होते है.  यह सब समय व् परिस्थितियों  के अनुरूप चेतन मन के धरातल पर प्रकट होती है. हम किसी भी पुरानी घटना का स्मरण  अवचेतन मन के कारण ही कर पाते  है क्योकि जो भी ज्ञान , अनुभव , स्मृति आदि अवचेतन मन में ही संग्रहित होते है! यह मन तब भी सक्रिय रहता है , जब चेतन मन क्रियाशील नही रहता है ! उदहारण के लिए गाड़ी चलाते  समय हम दोनों काम कर सकते है, गाड़ी चलाना और गाने सुनना या किसी से बात करना . बात करते समय या गाने सुनते समय हमारा चेतन मन क्रियाशील होता है, जबकि गाड़ी चलने की  प्रेरणा  अवचेतन मन से प्राप्त होती है, क्योकि वह कार्य हम उस कार्य के प्रति बिना जागृत हुए भी कर लेते है !  इस तरह जीवन में हम जो भी कर्म करते है ! उसमे चेतन मन और अवचेतन मन दोनों की सहभागिता होती है ! 

जब भी हम कोई कार्य बार बार दोहराते है , तो दोहराने की आवृति और तीव्रता के अनुसार वह सूचना , अनुभव , ज्ञान , अवचेतन मन में संचित हो जाता है ! उस संचित अनुभव की तीव्रता ही परिस्थिति की  प्रतिक्रिया के लिए उत्तरदायी होता है ! उदहारण के लिए जब कोई प्रथम बार धुम्रपान करना है तो उसका अनुभव अचेतन मन में संचित हो जाता है अवचेतन मन में संग्रहित वह अनुभव बार- बार धूमपान के लिए उत्तेजित करता है ! चेतन मन यह जानते हुए भी की धुम्रपान करना स्वस्थ के लिए हितकर नही होता है, मनुष्य धूम्रपान करता रहता है ! इस उदाहरण से यह भी सिद्ध होता है कि जब चेतन मन और अवचेतन मन के बीच मत भिन्नता होगी तो अवचेतन मन ही विजयी होता है  ! अतः अवचेतन मन से स्मृति अनुभव जन्य संस्कारो को मिटाना बहुत कठिन होता है. दूसरा उदाहरण है मैं की भावना का विद्यमान होना. किसी भी छोटे बच्चे को यह सिखाना नही पड़ता. वह स्वयम ही थोड़ी समझ का विकास होने पर वस्तुओं और अपने प्रिय व्यक्तियों पर अपना अधिकार समझने लगता है.

अतिचेतन अवस्था योगियों की अवस्था होती है. जब शरीर और मन की श्रेणी से ऊपर उठकर केवल आत्मा के द्वारा ही कार्यों का सञ्चालन किया जाता है तो मैं और दुसरे का भाव अर्थात द्वैत का भाव समाप्त हो जाता है.अतिचेतन की अवस्था प्राप्त करने के लिए चेतन और अवचेतन मन दोनों को संयमित करना अति आवश्यक होता है.

मन की कार्यशैली -

हमारा दृष्टिकोण सीमित होने के कारण मन और कर्म के सम्बन्ध को समझ नहीं पाते है. मन की प्रवृत्ति वाह्यमुखी होती है अर्थात संसार की ओर उन्मुख रहता है. इस कारण सांसारिक वस्तुओं के प्रति सहज आकर्षण रहता है. मन की दूसरी प्रवृत्ति है कि वह नकारात्मक चीजों से स्वयं को आसानी से जोड़ लेता है और सकारात्मक चीजो को सहजता से भूल जाता है. मन की तीसरी प्रवृत्ति यह है कि  वह अत्याधिक चंचल है अर्थात किसी भी विचार पर अधिक देर नहीं टिक सकता है। हम दिन भर इसी कारण विचारों के भंवर में घूमते  रहते हैं और रात को भी स्वप्न के रूप में अतृप्त विचारों को  ही देखते रहते है। मन की चतुर्थ प्रवृत्ति है कि वह नित्य नयी वासनाओं को जन्म देकर दूसरी नयी वस्तुओ अथवा व्यक्तियों  में सुख की तलाश करता है। यह समस्त गुण उन्ही व्यक्तियों में अधिक होती है जिनके कर्मों में शुद्धता नहीं होती है. 

कर्म भौतिक और मानसिक संसार दोनों को जोड़ता है. भौतिक संसार के निमित्त किया गया कर्म मन पर भी प्रभाव डालता है . किये गए कर्म का अनुभव अवचेतन मन में संगृहीत होकर चेतन मन को उसका स्मरण कराता रहता है और बार बार एक विशेष प्रकार के कर्म करने को उकसाता रहता है. वह कर्म पुनः उस प्रवृत्ति को पोषित करता है. उस विशेष प्रकार की प्रवृत्ति को वह विशेष कर्म तब तक प्रभावित करता रहता है जब तक चेतन मन यह दृढ निश्चय नहीं कर लेता कि अशुभ प्रवृत्ति के अनुसार कर्म नहीं करना है. उदाहरण के लिए जब क्रोध किसी परिस्थिति में आता है तो एक बार का क्रोध प्रदर्शन भौतिक रूप में सामने वाले व्यक्ति के आहत होने के रूप में सामने आता है. साथ ही क्रोध करने वाले व्यक्ति की उर्जा का क्षय वाणी के रूप में होता है, जिसके कारण उसको भी शारीरिक थकान और मानसिक अशांति का अनुभव होता है. यह उस समय का परिणाम हो गया किन्तु सूक्ष्म रूप में क्रोध का संस्कार अवचेतन मन में संगृहीत हो जाता है. अवचेतन मन बार बार स्मृति के द्वारा उस घटना की मानसिक पुनरावृत्ति करा कर तर्क वितर्क में उलझा देता है और उस घटना से सम्बन्ध, घटना के समाप्त हो जाने के पश्चात भी बना रहता है. दूसरे स्वरुप में अब जब भी कोई अप्रिय घटना होती है तो क्रोध का संस्कार बार-बार क्रोध करने को प्रेरित करता है. बार-बार क्रोध करने से क्रोध का संस्कार प्रबल हो जाता है और कोई भी छोटी सी घटना आवेशात्मक व्यवहार का कारण बन जाती है. यह सनातन नियम है कि क्रोध के साथ विवेक और ज्ञान नहीं रह सकते. क्रोध की पुनरावृत्ति के कारण क्रोध का स्वभाव सबल होता जाता है परिणामतः ज्ञान और विवेक की शक्ति स्वतः ही क्षीण होने लगती है. दिव्य गुणों के क्षीण होने के कारण जीव का स्वयं के ऊपर से नियंत्रण शनैः शनैः समाप्त हो जाता है और वह पूर्णतः मन में संगृहीत संस्कारों के अनुरूप ही कार्य करता रहता है. यह क्रोध का संस्कार सूक्ष्म शरीर के साथ नए शरीर में प्रवेश कर जाता है . यही कारण है कि कुछ बच्चों में क्रोध की अधिक मात्रा बचपन से ही विद्यमान होती है. 

जन्म और मरण के चक्र के लिए तीन कारण प्रमुख है - 1 - अज्ञानता, 2- इच्छा , 3- अहम् का आरोपण 

इन तीनों कारणों का प्रमुख आधार मन ही है. अज्ञानता के कारण सुख प्राप्त करने की अभिलाषा में अनेक विचारों को जन्म देते है। उन विचारों की बार बार पुनरावृत्ति कर उनको सबल बनाते है . इसके कारण इच्छाशक्ति सबल विचारों से जुड़कर उन्हें क्रियान्वित करने के मार्ग ढूंढती है । यदि उन इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती है तो दुःख होता है और यदि पूर्ती हो जाती है तो कई बार उससे पूर्ण संतुष्टि प्राप्त नहीं होती है . यदि उन इच्छाओ से उस समय के लिए संतुष्टि प्राप्त भी हो जाये तो वह क्षणिक होती है क्योकि संसार की समस्त वस्तुएं  अस्थिर होने के कारण उनके द्वारा प्राप्त सुख भी अस्थायी होता है। अनेक इच्छाओं के कारण मन की स्थिरता समाप्त हो जाती है, जिससे सही और गलत का विवेक भी क्षीण हो जाता है। हम बिना विचारे ऐसे कर्मों में प्रवृत्त हो जाते है जिनका दूरगामी परिणाम शुभ नहीं होता है । इच्छा पूर्ती हेतु कर्म करते समय  उससे प्राप्त होने वाले सुख की अनुभूति से स्वयं को जोड़ लेते है। यह अहम् अर्थात मै  का आरोपण ही बंधन का कारण बन जाता है। 

मन और स्वप्न -


शरीर ,मन और आत्मा तीनो एक दूसरे से विभिन्न स्तरों पर समन्वय करते है ! यह स्तर है - जागृत , स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्था 

जीव की जाग्रत अवस्था में आत्मा पूरी तरह स्थूल शरीर से जुडी होती है अर्थात जीव वाह्य संसार से जुड़ा हुआ होता है. दैनिक कार्यों के सम्पादन के लिए यह अवस्था आवश्यक है .यह आत्मा की निम्न अवस्था होती है और इस अवस्था में जीव ब्रह्म से बहुत दूर होता है .

आत्मा की स्वप्न अवस्था में उसका केवल स्थूल शरीर सोता रहता है किन्तु सूक्ष्म  शरीर जाग्रत रहता है.  इस अवस्था में जीव आत्मा का कार्य क्षेत्र और ध्यान वाह्यमुखी ना होकर अंतर्मुखी होता है. इसमें अंतर इतना ही है कि स्थूल शरीर की जो इच्छाएं संसार में पूर्ण नहीं होती, वही इच्छाएं सपनो में सूक्ष्म शरीर के द्वारा पूर्ण होती है. सूक्ष्म शरीर वाह्य शरीर के सोने पर प्रबल हो जाता है अर्थात अधिक क्रियाशील हो जाता है.

जीव जब अत्यंत गहन निंद्रा में जाता है तब उसे वाह्य जगत या आंतरिक विचार किसी का ध्यान नहीं रहता है तो सुषुप्ति की अवस्था होती है.  प्रायः इस अवस्था में स्वप्न भी नहीं  आते है. इसमें इन्द्रियाँ एवं मन शांत हो जाते है .इस अवस्था में  जीव-आत्मा का उस परम चेतना से सम्बन्ध गहन स्थापित हो जाता  है. आत्मा का शरीर और मन से सम्बन्ध कुछ क्षणों के लिए छूट जाता है और अपने यथार्थ स्वरुप में आता है .इस अवस्था से जागने पर मनुष्य  को सो कर उठने के बाद अत्यंत आनद की अनुभूति होती है.

तुरीय अवस्था - यह समाधी की अवस्था होती है. इसमें शरीर और मन का सम्बन्ध आत्मा से पूर्णतया विलग हो जाता है अर्थात केवल आत्मा का ही अस्तित्व रह जाता है. इसी अवस्था में परम आनंद की प्राप्ति होती है. तुरीय अवस्था जाग्रत अवस्था है. नींद और तुरीय अवस्था में यह भिन्नता होती है की नींद में भान ही नहीं होता है कि हम आत्मा के निकट पहुचे है किन्तु तुरीय अवस्था तक पहुचने में जो भी यात्रा की जाती है वह स्मरण रहती है. 

यही वह अवस्था है जहाँ आत्मा के द्वारा सूचना अवचेतन मन को दी जाती है . चेतन मन में यह शक्ति होती है कि वह अवचेतन मन तक पहुँचकर उसमे संग्रहित सूचना को ऊपर सतह पर लाता है! इस अवस्था में पहुचकर आत्मा के प्रकाश में जटिल समस्याओं का समाधान भी सहज मिल जाता है और घटनाओं का पूर्वाभास भी सही स्वरुप में होता है.  आत्मा के द्वारा प्राप्त संकेतों को यथार्थ रूप में समझने के लिए साधना की आवश्यकता होती है. बिना साधना के इन अवस्थाओं से पार जाने के लिए जाग्रत रहने की शक्ति प्राप्त नहीं होती है . जाग्रति के बिना आत्मा के दिशा निर्देशों का विस्मरण हो जाता है . 

अवचेतन मन जो भी सूचनाये दे , अंतिम निर्णय चेतन मन का ही होता है ! अवचेतन और चेतन मन की यह प्रवृत्ति होती है कि वह आत्मा के द्वारा दिए गये दिशा निर्देशनो का पालन नही करना चाहता है ! मन जो करना चाहता है यह आवश्यक नही कि  वह आत्मा को स्वीकार हो ! स्वीकार नहीं होते हुए भी यदि मन यह निर्णय लेता है कि उसे वह कार्य करना है तो आत्मा और शरीर भी बंधन में आ जाते है ! जब उस कार्य में आत्मा की सहमति नही होती है तो उस कार्य को करने में समस्याओ का सामना अधिक  करना पड़ता है! यदि आत्मा की स्वीकृति होती है तो कार्य सहज रूप से संपन्न होते है. 

कभी कभी चेतन मन , अवचेतन मन से सूचना नही ला पाता है ! इसका कारण यह है की वह प्रक्रिया जिससे आधार पर सूचना लाई जाती है , उसमे कमी होती है !  मन की शक्ति आत्मा से जुड़े रहने के कारण असीम  होती है  किन्तु इसकी शक्ति को व्यवस्थित करने की आवश्यकता होती है ! अवचेतन मन स्वतंत्र होने की शक्ति तो देता है परन्तु उसको क्रियान्वित करने के लिए चेतन मन के विचार ही अवचेतन मन का आधार बनते है, चेतन मन के द्वारा ही अवचेतन मन की असीम ऊर्जा का उपयोग संभव हो पाता है ! सकारात्मक विचारो के द्वारा अवचेतन मन की ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग किया जा सकता है, किन्तु यदि यही विचार नकारात्मक प्रवृत्ति के हो तो अवरोध उत्पन्न करते है और ऊर्जा के प्रवाह को बाधित करते है  इसलिए विचारो का संतुलित और शुद्ध होना अध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है !

 मन को नियंत्रित करने की विधि -

शरीर मन और आत्मा में संतुलन ही जीवन को सुखी और संतुलित बना सकता है . मन को समझकर ही मन को नियंत्रित किया जा सकता है. जो कुछ भी भौतिक है अर्थात इन्द्रियों द्वारा महसूस किया जा सकता है उसका एक निश्चित परिमाण होता है. इसी प्रकार मन का भी एक निर्धारित प्रवृत्ति और कार्य क्षेत्र होता है. यही मन की सीमा भी तय हो जाती है. मन कभी भी स्थिर नहीं रहता है , इसका तात्पर्य यह है की या तो वह भूतकाल की घटनाओं का विश्लेषण करता है या भविष्य की परिकल्पना में व्यस्त रहता है. जब मनुष्य वर्तमान को निरपेक्ष भाव से देखने लग जाता है तो उसकी उर्जा का क्षय रुक जाता है. बुद्धि के माध्यम से ही इच्छाओं को नियंत्रित किया जाता है. जैसे जैसे मन नकारात्मक संस्कारों से मुक्त होता जाता है भावनाओ और परिस्थितियों से मन उतना ही कम प्रभावित होता है.जो व्यक्ति जागरूक होता है वह मन के स्वभाव और सीमाओं को पहचान कर मन को रूपांतरित कर सकता है.

मन को किसी चीज पर टिकने के लिए हमेशा एक आधार की आवश्यकता होती है. उसी आधार से मन उर्जा ग्रहण कर सुख या दुःख की प्रतीति कराता है. यदि मन का आधार सांसारिक वस्तुए हो तो वह दुःख का कारन बनती है किन्तु यही आधार यदि इश्वर हो जाये तो आनंद की अनुभूति होती है.  मन कभी भी किसी चीज पर ज्यादा देर टिक नहीं सकता . हमेशा परिवर्तित होता रहता है. जब वह किसी विचार पर रूकता नहीं है तो निरंतर गतिशील होने के कारण मानसिक उर्जा का क्षय हो जाता है . इस कारण विचार की उत्पत्ति के कारण और उसके परिणाम का अध्यन संभव नहीं हो पाता है. मन जिस भी वस्तु या विचार से स्वयं को जिस तीव्रता के साथ जोड़ लेता है उसी अनुपात के अनुसार बंधन का निर्माण होता है. जब मन स्थिर होता है तो किसी भी विचार की गहराई में जाने का सामर्थ्य प्राप्त होता है जिससे विचार की उत्पत्ति, प्रकृति और परिणाम का अनुमान लगाना संभव हो पाता है.  जब विचार के परिणाम का ज्ञान पूर्व में ही हो जाता है तो कर्म का स्वरुप परिवर्तित करना संभव हो जाता है और बंधन का निर्माण नहीं होता है.

मनुष्य को एकाग्र करने और नकारात्मक संस्कारों/प्रवृत्तियों  को शुद्ध करने के लिए निरोध अर्थात वृत्तियों के अनुरूप कर्म नहीं करने की आवश्यकता होती है, जिससे उर्जा के क्षय को नियंत्रित किया जा सके  . मन इन्द्रिय सुख वाली वस्तुओं के प्रत्यक्षीकरण और आवेग  द्वारा क्रियाशील होता है ! यही कारण है कि मनुष्य को मन को नियंत्रित करने के लिए निरोध की आवश्यकता पड़ती है.  मन संयमित करने के लिए आठ अंग है - यम , नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,धारणा,ध्यान इत्यादि ! मन का परिवर्तन संस्कारों के अत्यंत प्रबल होने के कारण सहज रूप से संभव नहीं है. इसके लिए लम्बे समय तक अभ्यास की आवश्यकता होती है. निरंतर अभ्यास के फलस्वरूप चेतन मन में शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा का सृजन होता है. इसी ऊर्जा के आधार पर अवचेतन मन में निहित अदृश्य संस्कारों का शोधन कर स्वभाव में परिवर्तन लाया जाता है. जब स्वभाव परिवर्तित होता है तो कर्मों में शुद्धता आती है. शुद्ध कर्मों से विवेक और वैराग्य की प्राप्ति होती है, जो कि आत्म ज्ञान प्राप्ति के मूल आधार है. 

मन द्वारा भाग्य परिवर्तन -

भाग्य के दो पक्ष है - स्थिर पक्ष और परिवर्तनशील पक्ष. भाग्य का स्थिर पक्ष स्थायी होता है और अपरिवर्तनीय होता है. उदाहरण के लिए माता, पिता , परिवार , संस्कृति, देश और शारीरिक संगठन इत्यादि कर्म के पक्ष स्थायी प्रवृत्ति के होते है. परिवर्तनशील घटक स्वभाव और प्रवृत्ति है. इसको अध्ययन, अभ्यास, और इच्छा शक्ति के संयोग से परिवर्तित किया जा सकता है.

धार्मिक कृत्यों का नियम पूर्वक पालन करने से विचारों की गुणवत्ता में परिवर्तन होता है. यह परिवर्तन कर्म के स्वरुप में परिवर्तन लाता है जिससे विचारों की संख्या पर नियंत्रण होता है.  विचारों की गुणवत्ता और संख्या में सुधार होने पर मन में स्थिरता आती है. इस स्थिति में जब वेदों और उपनिषदों द्वारा प्राप्त ज्ञान को जब हृदयंगम किया जाता है तो मन को अंतर्मुखी होने की शक्ति प्राप्त होती है .

ज्योतिष विज्ञान ग्रहों के माध्यम से सकारात्मक और नकारात्मक संस्कारों, प्रवृत्तियों , इच्छाओं और स्वभाव  को निरुपित करते है. इसके साथ ही जब समस्याओं का केंद्र निर्धारित हो जाता है तो विशेष कर्मों अर्थात उपायों द्वारा नकारात्मक उर्जा को सकारात्मक उर्जा से विस्थापित करते है. उपायों को निरंतर करने से सकारात्मक उर्जा सबल होती है और चेतन मन के शुद्धिकरण के पश्चात अवचेतन मन में प्रविष्ट होती है, जहाँ पर समस्या का मूल बीज विद्यमान होता है. यह बीज जितना गहरा होगा , उसके उन्मूलन में उतना ही अधिक समय लगता है. निरंतर केन्द्रित कर्म रुपी उपायों द्वारा नकारात्मक प्रवृत्ति क्षीण होने लगती है और मन ज्ञान , विवेक और वैराग्य जैसे दिव्य गुणों को धारण करने के लिए समर्थ होने लगता है. इस सामर्थ्य का विकास मंत्र जाप, ध्यान और निस्स्वार्थ सेवा इत्यादि कर्मों से जब किया जाता है तो मन में अंतर्मुखी होने की प्रवृत्ति का विकास होता है और आत्म ज्ञान का सही स्वरुप सम्मुख आता है. इस ज्ञान के बल के आधार पर शरीर और मन से ऊपर उठकर जीव आत्मा में स्थित हो जाता है, क्योकि जब कर्म ज्ञान के आधार पर जाग्रति के साथ किये जाते है तो  कर्मों के प्रति अहम् का आरोपण समाप्त हो जाता है . निष्काम कर्म से नए सांसारिक फलों का अर्थात बंधन का निर्माण नहीं होता है फलस्वरूप निष्काम कर्मों की ऊर्जा मन को उर्ध्व गति प्रदान कर परमात्मा से मिलने  में सहायता प्रदान करती है.